स्वच्छ भारत

एक शहरी बस्ती का दृश्य है .सब तरफ गन्दगी फैली है ..कूड़े के ढेर ,पानी से भरी नालियां ,और इधर उधर प्लास्टिक की बोतलें एवं थैलियाँ पड़ी हैं .
सूत्र धार स्टेज पर प्रवेश करता है …अरे अरे यह सब क्या है ,इतनी गन्दगी ,कैसी बदबू आ रही है . नालियों से पानी बह रहा है .यहाँ तो
बीमारी फ़ैलाने का भी खतरा है .
इतने में दो मच्छर उड़ते हुए स्टेज पर चक्कर लगते हैं .
पहला मच्छर :अरे भाई वाह वाह कितना मज़ा आ रहा है . कितना पानी जमा है .अब तो हम आराम से यहाँ अंडे दे सकते है .हमरा कुल अब कितना बड़ा हो जायेगा .वह भाई वाह ,मजा आ गया . हमारा परिवार बढ़ रहा है .हा हाआआ .अब तो बहुत ऐश करेंगे .सब और हमारा ही राज होगा .
दूसरा मच्छर : हाँ भाई क्यूँ नहीं .हमारा ही राज होगा. हम सब लोगों का खून मजे से पियेंगे .हा हा हा .इतना ही नहीं हमारे पैरों के साथ गंदे कीटाणु भी लोगों के शारीर में जायेंगे और वो सब बीमार पड़ेंगे .
हम ही तो मलेरिया और डेंगू बुखार फैलाते हैं .जिससे कई बार तो लोगों की मौत भी हो जाती है .
इतने में एक मक्खी भिनभिनाती हुई स्टेज पर आती है .अरे वा ह भाई मच्छरों की सभा चल रही है क्या. बड़े खुश लग रहे हो
दोनों मच्छर : अरे आओ आओ बहना, तुम भी आ जाओ .आज कल तो इन मनुष्यों ने हमारे खाने पीने का खूब व्यवस्था कर रखीं है . पेट भर खाने को है तुम भी आ जाओ . मिल कर सब ऐश करेंगे .
मकखी: और नहीं तो क्या ,देखो कितनी जूठन छोड़ देते हैं ये लोग हम लोगों के लिए और दुसरे कीड़े मकोड़ों के लिए . खुद भी खाओ और अपनी आबादी भी बढायो . हा हा हा हा
मुर्ख नहीं जानते हम यही कूड़ा कैसे इनके घरों में ही नहिनिंके शरीरों में भी ले जाते हैं .
हम यहाँ तो बस घुमने गिरने ही आते हैं .असली मजा तो तब आता है जब यह अपने लिए खाना परोसते हैं तो सबसे पहले हम मक्खियाँ ही तो भोग लगा लेती हैं .यह लोग खाना ढकते ही नहीं. सबसे पहले खाना भी खाते हैं और हमारे पैरों से लगे कीटाणु भी खाने में छोड़ देते है .फिर वह खाना खा कर लोग बीमार हो जाते हैं . हैजा तो हमीं फैलती हैं .
प्लास्टिक की बोतल :अरे अरे मैं ना होती तो मच्छर बाबु तुम कैसे पैदा होते . देखो मुझे लोगो खाली कर के कहीं भी फैंक देते हैं . मुझ में जब पानी इकट्ठा होता है तभी तो तुम पैदा होते हो . अगर मैं नाली में गिर जाऊं फिर तो बाढ तक ल सकता हूँ . इतना ही नहीं मुझे तो कोई मिटा ही नहीं सकता .मुझे जला भी दें तो भी मैं जिन्दा रहता हूँ .
मैं जगह पर पड़ा होता हूँ वहां की उपजाऊ शक्ति हमेशा हमेशा के लिये ख़त्म हो जाती है , कुछ पैदा ही नहीं हो सकता .
(इतने में एक महिला अपने घर से निकलती है और घर का कचरा खर के बाहर दरवाजे पर फैंक देती है .)
तभी सूत्रधार प्रवेश करता है .अरे बहन जी , यह आप क्या कर रही हैं .आप देख रही है आप के घर के पास इस गन्दगी में मक्खी मच्छर पनप रहे हैं .ऐसे में तो यहाँ महामारी फैलने का भी खतरा है.
महिला अच्छा बीमारी न फैले इसीलिए तो मैं अपना घर रोज़ साफ़ करती हूँ .
सूत्रधार : पर जब आपने यह कचरा अपने घर के बाहर डाल दिया तो इस पर जो कीटाणु ,मच्छर ,मक़खी पैदा होगे वे तो आपके घर भी जायेंगे न .उनके पास आपका पता तो है नहीं कि इस घर की सफाई हुई है यहाँ नहीं जाना .इतना ही नहीं अपने साथ कीटाणु भी आपके घर ले जायेंगे .
(अब महिला सोच में पड़ जाती है )
महिला : अरे यह तो मैंने सोचा ही नहीं .मच्छरों के कारण तो हम बड़े परेशान हैं, रात भर काटते हैं और सोंने भी नहीं देते .पिछले ही महीने मेरी मुन्नी को मलेरिया होगया था .
अब हम क्या करें सभी तो यहीं कचरा डालते हैं तो हम भी यहीं डाल देते है.
इतने में टीचर जी अपने स्कूटर पर वहां से गुजरे . कूड़े का ढेर देख कर वे भी वहीँ रुक जाते हैं .
टीचर जी : ओह हो ,कब हम लोग सुधरेंगे. अपने घर की सफाई तो कर लेते हैं पर गली मुहल्ले को गन्दा करते है. जानते नहीं आजकल खुत हमारे प्रदहं मंत्री और बड़े बड़े लोग जगह जगह जा कर सफाई कर रहे हैं और एक तुम हो कि अपने मोहाल्ले को भी साफ़ नहीं रख सकते .
तभी दो बच्चे वहां से गुजरते हैं .टीचरजी आवाज़ लगाते हैं . अरे सोनू मोहन इधर आओ ,चलो आज हम सब मिल कर इस गली की सफाई करेंगे .गली मे आवाज़ सुन अब तक कुछ और लोग भी इक्कठा हो गए थे .
एक व्यक्ति बोला ‘अरे क्या हुआ क्यूँ इतना शोर मचा रखा है’’ .
टीचर जी बोले – चलिए हम सब मिल कर अपने मोहल्ले का स्वच्छ बनायें . इसमें हमारा ही भला है .एक स्वच्छ भारत का सपना तभी पूरा होगा जब हम सब सहयोग करें . इससे न केवल पर्यावरण सुंदर होगा बल्कि कीटाणु भी नहीं फैलेंगे सभी स्वस्थ होंगे .स्वस्थ होगे तो खुस भी होंगे .क्यूँ भाई ठीक हैं
हाँ हाँ बिलकुल सही , टीचर जी हम सब आप के साथ हैं . .
सभी मिल कर कचरा कचरा- पेटी में भरते हैं और झाड़ू फावड़े से सारी सफाई करते हैं .अब तक सब बच्चों में भी उत्त्साह आ जाता है और मिल कर नारा लगाते हैं :
’’गलियों न मैदानों में कूड़ा कूडेदानो में ‘’
‘’हमरा सपना – स्वच्छ भारत ‘’
अब टीचर जी कहते हैं :
स्वछ्ता- स्वछ्ता है ,

तेरी बहुत आवश्यकता,
स्वच्छ रहें हम तन और मन से ,

खिल उठें जीवन हम सब के

स्वचछ् वातावरण स्वचछ् विचार

,कभी ना पड़े कोई बीमार .
खिल उठे हम सबका जीवन ,

कहते सारे वाह भई वाह.
सूत्र धार : आइये हम स्वच्छ भारत का संकल्प लें . अपने देश को स्वच्छ ओर सुंदर बना कर पुरे विश्व में अपना नाम रोशन करें . आज के बाद कोई भी गन्दगी न फैलाएं .
१.कच्ररा कच्ररा – पेटी में ही फेंकें .

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Published in: on November 1, 2014 at 9:39 am  Leave a Comment  

नदिया

पहाड़ों का सीना चीर
बहती अनंत की ओर
नहीं जानती अपनी मंज़िल
न अपना कोई छोर .
बढती जाती बिन आश के
न कोई मन में संकल्प
निष्काम भाव से पूर्ण समर्पण
करती अपना जीवन.
लम्बा रस्ता कठिन डगर
मुझको नहीं डराते
अपनी धुन मैं बढती जाऊं
बिना तनिक घबराए .
मेरी राह में जो भी आते
सबको करूँ मैं तृप्त
मुझको वे मैला भी करते
फिर भी न होती विक्षिप्त .
सेवा भाव से अपने कर्तव्य
का करती मैं सदा निर्वहन
मेरे तट से प्यासा कोई लौटे
मुझको नहीं है सहन .
जीवन भी नदिया जैसा
कुछ भी नहीं है कठिन
निष्काम कर्म जो करें तो
हर पल हो जाता सरल .
-सूक्षम लता महाजन

Published in: on October 29, 2014 at 11:54 am  Leave a Comment  

मैं

अपने स्वार्थ से ऊपर उठ कर
सबके सुख का ध्यान रख कर
करें कार्य जब अपने सब हम
भोर का सूरज प्रकट हो जग पर .

आपाधापी में क्यूँ लगा इंसान
अच्छे बुरे की भूला पहचान
लगा सदा हिसाब लगाने
क्या पाया के ढूँढे निशाँन .

‘मैं ’ही रह गया सर्वोपरि
अपनी साख की फिकर बड़ी
दूजे का करूँ कैसे दोहन
हर क्षण ताक है लगी यही .

अच्छा सब मैं ही करता
दूजे का पेट भी मैं ही भरता
मेरे सिवा न करे कोई काम
मैं ही सबके कष्ट भी हरता .

मेरी ही पूजा हो हर ओर
मेरे आगे न चले कोई जोर
मैं ही सूत्रधार , निर्देशक
सब पकडे बस मेरा छोर .

भगवान मान पूजें सब मुझको
मेरी सूरत और सीरत को
मेरे ही हो गुणगान सदा
सुख मिले, फिर मेरे मन को .
-sukshm ‘lata’ mahajan

Published in: on October 27, 2014 at 4:49 am  Leave a Comment  

Deepawali

हमारी रीतें हमारे रिवाज़
याद दिलाते हमें त्यौहार
आओ मिल कर ख़ुशी मनाएं
कभी न भूलें अपने संस्कार .

त्योहारों से निखरे अपनापन ,
लौट आता फिर से बचपन
उत्साह उमंग से मन भर जाता
जब होते अपने सब प्रसन्न .

निश्छल प्रेम और व्यवहार
जब आये जीवन में प्यार
राग द्वेष से मिले छुटकारा
सुखी हो जाये सारा संसार .

दीपावली है प्रतीक ख़ुशी का
समृधि और भरपूर खुशी का
मिलजुल कर सब ख़ुशी मनाते
भूलें गम सब अपने जीवन का .

दीपावली यूँ हर दिन मनाते रहें
जीवन को खुशियों से सजाते रहे
जीवन में मिला जो खुश रह उसमें
जीवन को सहज बनाते रहें .
-सूक्ष्म लता महाजन

Published in: on October 22, 2014 at 6:47 am  Leave a Comment  

कलपुर्जे

कलपुर्ज़े बन गये इंसान
मुर्दा हैं ज़िंदा इंसान
जिये कोई या फिर मरे
विचलित नहीं होता इंसान

कितना निश्चिन्त और व्यस्त
घर पड़ोसी का हो रहा ध्वस्त
फिर भी नहीं घबराता इंसान
वाह रे ! आज के आधुनिक इंसान

आँख मूँद कर चले इंसान
झूठ मूठ की रखे पहचान
सम्पर्क विस्तार है करता फिरता
काम किसी के न आता इंसान

मीठा मीठा बोले इंसान
देख ख़ूब मुसका़ये इंसान
पर मौक़े पर हो जाता गुम
भोला भाला चतुर इंसान

Published in: on September 8, 2014 at 6:00 am  Leave a Comment  

मीरा

प्रेम में मगन हो मीरा नाचे
श्याम सलोने की बंसी बाजे
सुध बिसराये नाचे मीरा
मधुर छवि उर भीतर साजे।

मेरे हृदय बस तूँ ही मोहन
सुंदर श्यामल अनोखी चितवन
सदा रहूं में संग तुम्हारे
यही आस बसी है मोरे मन.

तुम बिन मैं यूँ , जैसे जल बिन मीन
नैनन में छवि , मन तुम में लीन
जीना मरना तुम संग मोहना
मैं तुझ में तू मुझ में विलीन

Published in: on August 20, 2014 at 5:11 am  Leave a Comment  

तिरंगा

तिरंगा है मान देश का
शान और पहचान देश का
हमको है इस पर अभिमान
गौरव और सम्मान देश का।

रंग इसके प्रतिबिम्ब हमारे
हमको अपनी जान से प्यारे
करने को हम इसकी रक्षा
अपना तन मन सब कुछ वारें ।

केसरिया रंग प्रतीक वीरों का
हरा रंग लहराते खेतों का
चक्र दर्शाता प्रगति चक्र को
सफ़ेद रंग अहिंसा ,प्रेम का ।

जी जान से करें हम रक्षा
इसका गौरव न पड़ने दे फीका
हम देश से देश हमीं से
आगे बढ़ने की सब करें समीक्षा।

“मैं’ छोड़ अब ‘ सब’ हो जाये
ख़ुद बढे औरौं को भी बढ़ाये
देश हमारा भी बढ़ता जायेगा
ऐसा कुछ जो हम कर पायें।

Published in: on August 12, 2014 at 12:14 pm  Leave a Comment  

नग्न

जालिमों ने किया नग्न
और मेरा शील भंग
अंग अंग भी किये भंग
काम न आया मेरा द्वन्द

अपराध मुझसे क्या हुआ
क्या नारी होंना अभिशाप हुआ
डर कर जीयूं क्यूँ प्रति पल
क्यूँ मानव यूँ बदहवास हुआ .

नग्न को भी कर रहे नग्न
कर रहे हर जगह प्रदर्शन
मेरी वीभत्स दुर्दशा का
करुना विहीन ,न है संवेदन .

Published in: on July 21, 2014 at 3:38 pm  Leave a Comment  

बरखा रानी

अब तो आ जाओ बरखा रानी
बरसाओ पानी न करो मनमानी
सूखी धरती और ताल तलैया
तू ने क्यूँ , न आने की ठानी

बैठे सब , तेरी राह निहारें
बेहाल हो , सब तुझे पुकारें
जल्दी करो, अब आ भी जाओ
मीठा जल बरसा जाओ .

पेड़ पंछी हुए हैं बेहाल
ताके अम्बर हो के दीन
फल फूल भी हैं कांति हींन
गंध और रस विहीन .

काहे को इतनी देर करो
जग पर अब तो मेहर करो
धरती का आँचल है सूना
आकर फिर इसे हरा करो .

काले बादल औढ के आओ
अम्बर से तुम जल बरसायो
सूखी धरती की प्यास बुझा कर
वर्षा फिर से पावन बन जाओ .

कर रहे हैं सब मनुहार
जल्दी से आ जाओ इस बार
जल थल कर दो फिर से धरा पर
खुशहांली का लगा दो अम्बार .

पेड़ पंछी हैं बेहाल, ताके अम्बर होके दीन
फल फुल हैं कांति हींन, गंध और रस विहीन

Published in: on July 11, 2014 at 3:49 am  Leave a Comment  

 

What is life.

 

Life is like a book,

every page unfolds a new truth

It is your decision as to how you took

The message conveyed in its looks.

 

Life is a riddle

Checking your power

To use the intellect

And the inherent critcal powers.

 

Life is a unique experience

Live it to the fullest

Don’t waste your wonderful moments

In criticism and fowl play.

 

 

Let your life be an example

Of serenity and wisdom

Giving solace to every soul

That comes your way  .

Published in: on May 2, 2014 at 10:36 am  Leave a Comment