नन्ही चिड़िया

सुबह सुबह इक नन्ही चिड़िया, डाले मेरे अंगना डेरा

दस्तक दे कर मुझे जगाये , रोज़  लगाती है वह फेरा.

लगे मुझे वो बहुत सगी सी, अपनी कोई बहुत करीबी

करूँ प्रतीक्षा मैं भी उसकी, खिले  देख उसे   मन मेरा .

रहता उसका मुझे इंतज़ार , आँखे देखें उसकी राह

बिन देखे न पड़ता चैन , मिलने की है रहती चाह .

बनी है वह  जीवन का हिस्सा, लगता कोई पुराना किस्सा

बैठ मुंडेर पर मुझे निहारे, अद्भुत सा संयोग है वाह रे .

कोई कहानी रही अधूरी , पिछले जन्म की शायद मेरे

उसे आकर पूरा है करती, रोज़ आ  कर वह फेरे भरती .

कुदरत के भी खेल निराले , छूट सके न चाह कर भी

पूरे करने को सब वादे , लौटें फिर अपने ही डेरे .

हम सब वादे पूरे करते , रूप अनेक है हम धर कर  ,

किसी रूप में किसी तरह से, रहें मिलते बहुत यत्न कर.

Published in: on April 17, 2015 at 1:19 pm  Leave a Comment  

धरनी

सुंदर कोमल बाला सी धरती, मधुर गीत है गाती
सुंदर नीले फूलों से , धरनी है लहराती .

कब यह छटा फिर धरा की, हम सब मिल कर देखें
इक नई प्यास ह्रदय में, है यह आज जगाती .

सहेज हम अपनी धरोहर, इसका मान बढ़ाएं
मनुहार करने को सबकी , सुंदर गीत है गाती .

कितने सुंदर रंग धरा के , दामन में हैं सिमटे
विनाश की गति को रोको , यही सन्देश दोहराती .

स्वर्ग धरा पर फिर बन जाए , करें प्रयास सभी जो ,
रोक लगाओ लालच पर, प्रकृति हमें पढ़ाती .
-सूक्ष्म लता महाजनBeautiful-nature-green-road-wallpaper

Published in: on April 9, 2015 at 6:10 am  Leave a Comment  

भीख देना किसी भी समस्या का समाधान नहीं है. अगर हम सब भीख न दें तो हर व्यक्ति अपने पोषण के लिए कार्य कर सकने में सक्षम है. भीख एक अभिशाप है. अगर ज़मीन  पर रेंगने वाला एक कीड़ा भी अपने लिए भोजन की व्यवस्था कर सकता है तो क्या एक मनुष्य अपने भरण पोषण के लिए कुछ नहीं कर सकता ? दुःख की बात है की आज माँगना भी एक व्यवसाय के रूप में देखा जाता है और इनके संगठन भी देखने में आते हैं जो व्यवस्थित रूप से अपना कार्य करते हैं किसी बाहर के आदमी  को वे अपने क्षेत्र में घुसने तक नहीं देते . भीख देकर क्या हम इस असंवैधानिक कार्य को बढ़ावा नहीं देते .

Published in: on April 8, 2015 at 6:26 am  Leave a Comment  

पहरा

सीमायों पर कड़ा है पहरा
फिर भी घिरा विषाद  गहरा
गुम हुया मानवता का उजियारा
अमन शांति न जाने कहाँ है ठहरा।

सहमा सहमा हर कोई फिरता
अनजाने भय से पल पल घिरता
उपाय कोई तो ढूँढ कर लायें
दूर करे जो व्याप्त रिक्तता।

खोखलेपन का फैला अँधियारा
खाता जाये अंतस को गहरा
दीमक जैसा चाट रहा है सब
अनजाना सा जो लगा है पहरा।
-सूक्षम लता महाजन

Published in: on January 7, 2015 at 1:23 pm  Leave a Comment  

बर्बरता

बर्बरता और नृशंसता की हदों को पार करता मानवीय व्यवहार मानव के मानव होने पर ही प्रश्न चिन्ह है ।हम आज सभ्यता के न्यूनतम स्तर पर पहुँच चुके हैं जहाँ मूल्यों संवेदना़यों के लिये कोई स्थान ही नहीं रह गया है ।
ऐसी दुर्घटना मानव के मानव होने पर ही प्रश्न चिन्ह लगा देती है । क्या अंतर है एक भूखे जानवर और इंसान के बीच ।
स्वार्थ और धर्म के नाम पर गुमराह कुछ भटके हुये नौजवानों को वापस समाजिक धारा में लाने की एक बड़ी चुनौती है ।समय पर कुछ क़दम नहीं उठाये गये तो पूरी मानव सभ्यता का ही विनाश हो जायेगा।
बुराई का अंत अच्छाई से करना होगा ।नफ़रत को नफ़रत से नहीं प्यार से ही समाप्त  किया जा सकता है ।
नफ़रतों को प्यार से हराना ही होगा
मानवता को विनाश से बचाना ही होगा
भटक गये हैं जो इंसानियत से मानव
उनको सही  राह पर लाना ही होगा

-सूक्ष्म लता महाजन

Published in: on December 17, 2014 at 6:11 am  Leave a Comment  

रेत के महल

About Education

रेत के महल हथेली पर सजाये
कब तक रहेंगे ख़ुद को बहलाये
मानवता टूट कर है बिखर रही
समय रहते कोई सोच लें उपाय।

मूल्य हो रहे हैं सारे ध्वस्त
लूटें असमत जो हैं विश्वस्त
किस पर अब करें विश्वास
सारे सम्बंध हो गये निरस्त ।

रक्षक भी हो गये हैं भ्रष्ट
अपने आप में सब हुये मस्त
दोषारोपण सब करते हैं रहते
लीपापोती में हैं रहते व्यस्त ।

-सूक्ष्म लता महाजन

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Published in: on December 12, 2014 at 4:56 am  Leave a Comment  

स्वच्छ भारत

एक शहरी बस्ती का दृश्य है .सब तरफ गन्दगी फैली है ..कूड़े के ढेर ,पानी से भरी नालियां ,और इधर उधर प्लास्टिक की बोतलें एवं थैलियाँ पड़ी हैं .
सूत्र धार स्टेज पर प्रवेश करता है …अरे अरे यह सब क्या है ,इतनी गन्दगी ,कैसी बदबू आ रही है . नालियों से पानी बह रहा है .यहाँ तो
बीमारी फ़ैलाने का भी खतरा है .
इतने में दो मच्छर उड़ते हुए स्टेज पर चक्कर लगते हैं .
पहला मच्छर :अरे भाई वाह वाह कितना मज़ा आ रहा है . कितना पानी जमा है .अब तो हम आराम से यहाँ अंडे दे सकते है .हमरा कुल अब कितना बड़ा हो जायेगा .वह भाई वाह ,मजा आ गया . हमारा परिवार बढ़ रहा है .हा हाआआ .अब तो बहुत ऐश करेंगे .सब और हमारा ही राज होगा .
दूसरा मच्छर : हाँ भाई क्यूँ नहीं .हमारा ही राज होगा. हम सब लोगों का खून मजे से पियेंगे .हा हा हा .इतना ही नहीं हमारे पैरों के साथ गंदे कीटाणु भी लोगों के शारीर में जायेंगे और वो सब बीमार पड़ेंगे .
हम ही तो मलेरिया और डेंगू बुखार फैलाते हैं .जिससे कई बार तो लोगों की मौत भी हो जाती है .
इतने में एक मक्खी भिनभिनाती हुई स्टेज पर आती है .अरे वा ह भाई मच्छरों की सभा चल रही है क्या. बड़े खुश लग रहे हो
दोनों मच्छर : अरे आओ आओ बहना, तुम भी आ जाओ .आज कल तो इन मनुष्यों ने हमारे खाने पीने का खूब व्यवस्था कर रखीं है . पेट भर खाने को है तुम भी आ जाओ . मिल कर सब ऐश करेंगे .
मकखी: और नहीं तो क्या ,देखो कितनी जूठन छोड़ देते हैं ये लोग हम लोगों के लिए और दुसरे कीड़े मकोड़ों के लिए . खुद भी खाओ और अपनी आबादी भी बढायो . हा हा हा हा
मुर्ख नहीं जानते हम यही कूड़ा कैसे इनके घरों में ही नहिनिंके शरीरों में भी ले जाते हैं .
हम यहाँ तो बस घुमने गिरने ही आते हैं .असली मजा तो तब आता है जब यह अपने लिए खाना परोसते हैं तो सबसे पहले हम मक्खियाँ ही तो भोग लगा लेती हैं .यह लोग खाना ढकते ही नहीं. सबसे पहले खाना भी खाते हैं और हमारे पैरों से लगे कीटाणु भी खाने में छोड़ देते है .फिर वह खाना खा कर लोग बीमार हो जाते हैं . हैजा तो हमीं फैलती हैं .
प्लास्टिक की बोतल :अरे अरे मैं ना होती तो मच्छर बाबु तुम कैसे पैदा होते . देखो मुझे लोगो खाली कर के कहीं भी फैंक देते हैं . मुझ में जब पानी इकट्ठा होता है तभी तो तुम पैदा होते हो . अगर मैं नाली में गिर जाऊं फिर तो बाढ तक ल सकता हूँ . इतना ही नहीं मुझे तो कोई मिटा ही नहीं सकता .मुझे जला भी दें तो भी मैं जिन्दा रहता हूँ .
मैं जगह पर पड़ा होता हूँ वहां की उपजाऊ शक्ति हमेशा हमेशा के लिये ख़त्म हो जाती है , कुछ पैदा ही नहीं हो सकता .
(इतने में एक महिला अपने घर से निकलती है और घर का कचरा खर के बाहर दरवाजे पर फैंक देती है .)
तभी सूत्रधार प्रवेश करता है .अरे बहन जी , यह आप क्या कर रही हैं .आप देख रही है आप के घर के पास इस गन्दगी में मक्खी मच्छर पनप रहे हैं .ऐसे में तो यहाँ महामारी फैलने का भी खतरा है.
महिला अच्छा बीमारी न फैले इसीलिए तो मैं अपना घर रोज़ साफ़ करती हूँ .
सूत्रधार : पर जब आपने यह कचरा अपने घर के बाहर डाल दिया तो इस पर जो कीटाणु ,मच्छर ,मक़खी पैदा होगे वे तो आपके घर भी जायेंगे न .उनके पास आपका पता तो है नहीं कि इस घर की सफाई हुई है यहाँ नहीं जाना .इतना ही नहीं अपने साथ कीटाणु भी आपके घर ले जायेंगे .
(अब महिला सोच में पड़ जाती है )
महिला : अरे यह तो मैंने सोचा ही नहीं .मच्छरों के कारण तो हम बड़े परेशान हैं, रात भर काटते हैं और सोंने भी नहीं देते .पिछले ही महीने मेरी मुन्नी को मलेरिया होगया था .
अब हम क्या करें सभी तो यहीं कचरा डालते हैं तो हम भी यहीं डाल देते है.
इतने में टीचर जी अपने स्कूटर पर वहां से गुजरे . कूड़े का ढेर देख कर वे भी वहीँ रुक जाते हैं .
टीचर जी : ओह हो ,कब हम लोग सुधरेंगे. अपने घर की सफाई तो कर लेते हैं पर गली मुहल्ले को गन्दा करते है. जानते नहीं आजकल खुत हमारे प्रदहं मंत्री और बड़े बड़े लोग जगह जगह जा कर सफाई कर रहे हैं और एक तुम हो कि अपने मोहाल्ले को भी साफ़ नहीं रख सकते .
तभी दो बच्चे वहां से गुजरते हैं .टीचरजी आवाज़ लगाते हैं . अरे सोनू मोहन इधर आओ ,चलो आज हम सब मिल कर इस गली की सफाई करेंगे .गली मे आवाज़ सुन अब तक कुछ और लोग भी इक्कठा हो गए थे .
एक व्यक्ति बोला ‘अरे क्या हुआ क्यूँ इतना शोर मचा रखा है’’ .
टीचर जी बोले – चलिए हम सब मिल कर अपने मोहल्ले का स्वच्छ बनायें . इसमें हमारा ही भला है .एक स्वच्छ भारत का सपना तभी पूरा होगा जब हम सब सहयोग करें . इससे न केवल पर्यावरण सुंदर होगा बल्कि कीटाणु भी नहीं फैलेंगे सभी स्वस्थ होंगे .स्वस्थ होगे तो खुस भी होंगे .क्यूँ भाई ठीक हैं
हाँ हाँ बिलकुल सही , टीचर जी हम सब आप के साथ हैं . .
सभी मिल कर कचरा कचरा- पेटी में भरते हैं और झाड़ू फावड़े से सारी सफाई करते हैं .अब तक सब बच्चों में भी उत्त्साह आ जाता है और मिल कर नारा लगाते हैं :
’’गलियों न मैदानों में कूड़ा कूडेदानो में ‘’
‘’हमरा सपना – स्वच्छ भारत ‘’
अब टीचर जी कहते हैं :
स्वछ्ता- स्वछ्ता है ,

तेरी बहुत आवश्यकता,
स्वच्छ रहें हम तन और मन से ,

खिल उठें जीवन हम सब के

स्वचछ् वातावरण स्वचछ् विचार

,कभी ना पड़े कोई बीमार .
खिल उठे हम सबका जीवन ,

कहते सारे वाह भई वाह.
सूत्र धार : आइये हम स्वच्छ भारत का संकल्प लें . अपने देश को स्वच्छ ओर सुंदर बना कर पुरे विश्व में अपना नाम रोशन करें . आज के बाद कोई भी गन्दगी न फैलाएं .
१.कच्ररा कच्ररा – पेटी में ही फेंकें .

Published in: on November 1, 2014 at 9:39 am  Leave a Comment  

नदिया

पहाड़ों का सीना चीर
बहती अनंत की ओर
नहीं जानती अपनी मंज़िल
न अपना कोई छोर .
बढती जाती बिन आश के
न कोई मन में संकल्प
निष्काम भाव से पूर्ण समर्पण
करती अपना जीवन.
लम्बा रस्ता कठिन डगर
मुझको नहीं डराते
अपनी धुन मैं बढती जाऊं
बिना तनिक घबराए .
मेरी राह में जो भी आते
सबको करूँ मैं तृप्त
मुझको वे मैला भी करते
फिर भी न होती विक्षिप्त .
सेवा भाव से अपने कर्तव्य
का करती मैं सदा निर्वहन
मेरे तट से प्यासा कोई लौटे
मुझको नहीं है सहन .
जीवन भी नदिया जैसा
कुछ भी नहीं है कठिन
निष्काम कर्म जो करें तो
हर पल हो जाता सरल .
-सूक्षम लता महाजन

Published in: on October 29, 2014 at 11:54 am  Leave a Comment  

मैं

अपने स्वार्थ से ऊपर उठ कर
सबके सुख का ध्यान रख कर
करें कार्य जब अपने सब हम
भोर का सूरज प्रकट हो जग पर .

आपाधापी में क्यूँ लगा इंसान
अच्छे बुरे की भूला पहचान
लगा सदा हिसाब लगाने
क्या पाया के ढूँढे निशाँन .

‘मैं ’ही रह गया सर्वोपरि
अपनी साख की फिकर बड़ी
दूजे का करूँ कैसे दोहन
हर क्षण ताक है लगी यही .

अच्छा सब मैं ही करता
दूजे का पेट भी मैं ही भरता
मेरे सिवा न करे कोई काम
मैं ही सबके कष्ट भी हरता .

मेरी ही पूजा हो हर ओर
मेरे आगे न चले कोई जोर
मैं ही सूत्रधार , निर्देशक
सब पकडे बस मेरा छोर .

भगवान मान पूजें सब मुझको
मेरी सूरत और सीरत को
मेरे ही हो गुणगान सदा
सुख मिले, फिर मेरे मन को .
-sukshm ‘lata’ mahajan

Published in: on October 27, 2014 at 4:49 am  Leave a Comment  

Deepawali

हमारी रीतें हमारे रिवाज़
याद दिलाते हमें त्यौहार
आओ मिल कर ख़ुशी मनाएं
कभी न भूलें अपने संस्कार .

त्योहारों से निखरे अपनापन ,
लौट आता फिर से बचपन
उत्साह उमंग से मन भर जाता
जब होते अपने सब प्रसन्न .

निश्छल प्रेम और व्यवहार
जब आये जीवन में प्यार
राग द्वेष से मिले छुटकारा
सुखी हो जाये सारा संसार .

दीपावली है प्रतीक ख़ुशी का
समृधि और भरपूर खुशी का
मिलजुल कर सब ख़ुशी मनाते
भूलें गम सब अपने जीवन का .

दीपावली यूँ हर दिन मनाते रहें
जीवन को खुशियों से सजाते रहे
जीवन में मिला जो खुश रह उसमें
जीवन को सहज बनाते रहें .
-सूक्ष्म लता महाजन

Published in: on October 22, 2014 at 6:47 am  Leave a Comment