नदिया

पहाड़ों का सीना चीर
बहती अनंत की ओर
नहीं जानती अपनी मंज़िल
न अपना कोई छोर .
बढती जाती बिन आश के
न कोई मन में संकल्प
निष्काम भाव से पूर्ण समर्पण
करती अपना जीवन.
लम्बा रस्ता कठिन डगर
मुझको नहीं डराते
अपनी धुन मैं बढती जाऊं
बिना तनिक घबराए .
मेरी राह में जो भी आते
सबको करूँ मैं तृप्त
मुझको वे मैला भी करते
फिर भी न होती विक्षिप्त .
सेवा भाव से अपने कर्तव्य
का करती मैं सदा निर्वहन
मेरे तट से प्यासा कोई लौटे
मुझको नहीं है सहन .
जीवन भी नदिया जैसा
कुछ भी नहीं है कठिन
निष्काम कर्म जो करें तो
हर पल हो जाता सरल .
-सूक्षम लता महाजन

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Published in: on October 29, 2014 at 11:54 am  Leave a Comment  

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