मैं

अपने स्वार्थ से ऊपर उठ कर
सबके सुख का ध्यान रख कर
करें कार्य जब अपने सब हम
भोर का सूरज प्रकट हो जग पर .

आपाधापी में क्यूँ लगा इंसान
अच्छे बुरे की भूला पहचान
लगा सदा हिसाब लगाने
क्या पाया के ढूँढे निशाँन .

‘मैं ’ही रह गया सर्वोपरि
अपनी साख की फिकर बड़ी
दूजे का करूँ कैसे दोहन
हर क्षण ताक है लगी यही .

अच्छा सब मैं ही करता
दूजे का पेट भी मैं ही भरता
मेरे सिवा न करे कोई काम
मैं ही सबके कष्ट भी हरता .

मेरी ही पूजा हो हर ओर
मेरे आगे न चले कोई जोर
मैं ही सूत्रधार , निर्देशक
सब पकडे बस मेरा छोर .

भगवान मान पूजें सब मुझको
मेरी सूरत और सीरत को
मेरे ही हो गुणगान सदा
सुख मिले, फिर मेरे मन को .
-sukshm ‘lata’ mahajan

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Published in: on October 27, 2014 at 4:49 am  Leave a Comment  

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